क्या कहूं किस से कहूं, अपने दिल का हाल सखी रानी चंदा सोनी


क्या कहूं किस से कहूं
क्या कहूं किस से कहूं, अपने दिल का हाल सखी।
बचपन में जीवन जीवन था, अब जीवन जंजाल सखी।

आई जवानी बोझ हो गए, हम तो अपने तात सखी।
हर दिन चौके में घिसती, हमको हमारी मात सखी।
सतरंजी पर सोना सिखा, छत की जगह तिरपाल सखी।

बचपन में जीवन जीवन था,अब जीवन जंजाल सखी।
अपना जिसको कहते थे, अब वो हमसे दूर सखी।
आंख तरसती है मिलने को, इतने हुए मजबूर सखी।
कल तक हम खुद बच्चे थे, बच्चो को रहें हैं पाल सखी।

बचपन में जीवन जीवन था, अब जीवन जंजाल सखी।
अपना लहू पिला कर उनको, दिनभर जले धूप सखी।
पेट ,पढ़ाई और पैसे में, बिके हमारे रूप सखी।
बने वो दो कोठी के मालिक, हम दिन पर दिन कंगाल सखी।
बचपन में जीवन जीवन था,अब जीवन जंजाल सखी।

नैनो की नगरी में सागर, ह्रदय हुआ पाषाण सखी।
वृद्धाश्रम है इसी बात का, एक जीता सा प्रमाण सखी।
संघर्षों में पाया था घर, उस से दिए गए हैं निकाल सखी।
बचपन में जीवन जीवन था,अब तो है जंजाल सखी।

रानी सोनी चंदा

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