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'माँ' दिल छू जाने वाली एक शानदार रचना कुमारी कीर्ति अमृता आशा
मेरे तरफ देखो बस तन्हा और तनहाई है। अंकित
रोज मर्रा के काम से थक हार जब घर लौट आता है
मैं हार जाऊँगी  ये कैसे मान लिया तुमने  कुमारी किर्ती अमृता आशा
 "महबूब" ना तेरा साथ मिला ना ही तू हमसफर  बना कुमारी किर्ती अमृता आशा
एडजस्टमेंट की उम्मीद सिर्फ लड़कियों से ही क्यों ..कुमारी किर्ती अमृता आशा
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