एक बेबस बाप बेचारा छोटी सी कविता ..अंकित कुशवाहा



ढ़लते सूरज को देख
खुद के बारे में सोचा
कभी कल्पना,कभी
इच्छाओं के चलते
खुद के परछाईयों को खुदेरा...

कुछ ख्वाब संजोये
कुछ उम्मीदों को जगाएं,
सोच कर मन ही मन
ये दिल मुस्कुराया...

एक अर्से बाद आज 
बेटा घर आया,
सारी खुशियां सारी हसरतें
साथ ले आया...।

मन प्रफुलित हुआ जब ,
व्याह कर बहूँ घर लाया।।
कुछ दिनों बाद घर में हुई किलकारी
नन्ही सी बच्ची लगती थी प्यारी...,

धीरे-धीरे क़िस्से पुराने हुए
जब धीरे-धीरे बच्चे सयाने हुए,,।।
वक्त का तख़्ता पलटा
उम्र ने भी अपना रुख मोड़ा....,

बेबस हो गया एक बाप बेचारा
बेदर्द बेटे ने अपना रंग दिखया।
कर न सका परवरिश अपने बाप का
उसे उसके ही घर से ठुकरा,
वृद्धाश्रम छोड़ आया।

अब भी उम्मीद आयेगा मेरा बेटा
फिर से होगा उस घर में,
एक नई किरण के साथ नया सवेरा..।।

सहसा ध्यान मग्न टुटा
जब दिल ने मुझे झकझोरा,
खुद से ही एक सवाल पूछा
मेरे दिल में ये वहम कैसे आया।।

ले जाना ही होता गर वापस 
वृद्धाश्रम क्यू छोड़ा होता,
धीरे धीरे आँखे नम हुई
नजरें उठा देखा...
सूरज डूब चूका था 
पास बैठा मुसाफिर जा चूका था।

बैठे बैठे आंसू खुद का पोछ रहे थे
जाने वाले हर मुसाफिर को देख रहे थे।।।

-अंकित  कुशवाहा
गाज़ीपुर   (उत्तर - प्रदेश)

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